500 वर्षेभ्यः पुरातनी परंपरा निर्व्यूढा : मातृभगिन्याः गृहं स्वच्छीकृत्य श्रद्धालुभिःकृतं भगवतो जगन्नाथस्य स्वागतम्
जयपुरम्, 15 जुलाईमासः(हि.स.)।भगवतः श्रीजगन्नाथस्य अनसरकालस्य समापनानन्तरं बुधवासरे जयपुरनगरे प्रायः पञ्चशतवर्षप्राचीना परम्परा सम्यक् निर्वाहिता। भगवतः पूर्णस्वास्थ्यलाभाय पुनः कदापि रोगग्रस्तः न भवेत् इति कामनया श्रद्धालुभिः तस्य मौस्याः गुण्डिचार
500 साल पुरानी परंपरा निभी: मौसी के घर की धुलाई कर श्रद्धालुओं ने किया भगवान जगन्नाथ का स्वागत जयपुर। भगवान श्रीजगन्नाथ के अनसर (बीमारी) काल के समापन के बाद बुधवार को जयपुर में करीब 500 वर्ष पुरानी परंपरा का निर्वहन किया गया। भगवान के पूर्ण स्वस्थ होने और दोबारा बीमार नहीं पड़ने की कामना के साथ श्रद्धालुओं ने उनकी मौसी गुंडीचा रानी के घर (शिव संस्कार भवन) की विशेष साफ-सफाई की। धार्मिक मान्यता है कि इस सेवा से भगवान का निवास स्थान शुद्ध, पवित्र और शीतल बना रहता है। जानकारी के अनुसार भगवान श्रीजगन्नाथ 15 दिन की अनसर अवधि पूर्ण कर बुधवार को बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर मौसी गुंडीचा रानी के घर सुंदरावल (नगर भ्रमण) के लिए प्रस्थान किया। इससे पहले अलसुबह श्रद्धालुओं ने मौसी के घर की पारंपरिक धुलाई और सफाई की। गुरु वृंदावन धाम की ओर से आयोजित सेवा के तहत चांदपोल स्थित गुरु वृंदावन धाम, दामोदर मंदिर तथा रामनिवास बाग स्थित गुंडीचा रानी के घर (शिव संस्कार भवन) में सुबह 4.30 बजे से भक्तों ने झाड़ू, पोछा और जल से फर्श, दीवारों, छत तथा कुंज गलियों की साफ-सफाई की। इसके बाद श्रीजगन्नाथ सेवा समिति, जयपुर की ओर से मंदिर परिसर को सजाकर भगवान के स्वागत की तैयारियां पूरी की गईं। गुरु वृंदावन धाम के अध्यक्ष अभिमन्यु दास ने बताया कि यह परंपरा लगभग 500 वर्ष पुरानी है। मान्यता है कि स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु ने करीब 500 वर्ष पूर्व पुरी में अपने हाथों से गुंडीचा मंदिर की जल से सफाई की थी। तभी से भगवान के मौसी घर को स्वच्छ, शीतल और पवित्र बनाने की यह सेवा निरंतर की जा रही है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा केवल बाहरी सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे अंतःकरण की शुद्धि और सेवा-भाव का भी प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीजगन्नाथ जब वृंदावन (सुंदरावल) जाने के भाव में होते हैं तो उनकी आंखें बड़ी हो जाती हैं। वे नौ दिनों तक मौसी के घर विशेष स्नेह और सेवा के बीच विश्राम करते हैं, जहां उन्हें विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का भोग अर्पित किया जाता है। इसके बाद भगवान पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। आयोजकों ने श्रद्धालुओं से सुंदरावल महोत्सव में अधिकाधिक संख्या में शामिल होकर सेवा कार्य में भाग लेने और भगवान श्रीजगन्नाथ के दर्शन का लाभ लेने का आह्वान किया।


जयपुरम्, 15 जुलाईमासः(हि.स.)।भगवतः श्रीजगन्नाथस्य अनसरकालस्य समापनानन्तरं बुधवासरे जयपुरनगरे प्रायः पञ्चशतवर्षप्राचीना परम्परा सम्यक् निर्वाहिता। भगवतः पूर्णस्वास्थ्यलाभाय पुनः कदापि रोगग्रस्तः न भवेत् इति कामनया श्रद्धालुभिः तस्य मौस्याः गुण्डिचाराज्ञ्याः गृहे शिवसंस्कारभवने विशेषमार्जनशोधनकार्यं कृतम्। धार्मिकमान्यतानुसारम् एतया सेवया भगवतः निवासस्थानं शुद्धं पवित्रं शीतलं च भवति।

उपलब्धसूचनानुसारं भगवान् श्रीजगन्नाथः पञ्चदशदिनात्मकम् अनसरकालं समाप्य बुधवासरे ज्येष्ठभ्रात्रा बलभद्रेण भगिन्या सुभद्रया च सह रथमारुह्य मौस्याः गुण्डिचाराज्ञ्याः गृहं सुन्दरावलनगरभ्रमणार्थं प्रस्थितः। ततः पूर्वम् अतिप्रातःकाले श्रद्धालुभिः मातृभगिन्याः गृहस्य पारम्परिकधावनमार्जनकार्यं सम्पन्नम्। गुरुवृन्दावनधामस्य आयोजनत्वे चान्दपोलस्थिते गुरुवृन्दावनधामे, दामोदरमन्दिरे तथा रामनिवासबागस्थिते गुण्डिचाराज्ञ्याः गृहे शिवसंस्कारभवने च प्रातः चतुर्वादनत्रिंशन्मिनिटसमयात् आरभ्य भक्तैः सम्मार्जनी, प्रक्षालनी, जलं च उपयुज्य भूमिः, भित्तयः, छदिः, कुञ्जवीथयः च सम्यक् शुद्धीकृताः। ततः अनन्तरं श्रीजगन्नाथसेवासमित्या जयपुरेण मन्दिरपरिसरः अलङ्कृतः तथा भगवतः स्वागतस्य सर्वाः सिद्धयः सम्पन्नाः।

गुरुवृन्दावनधामस्य अध्यक्षः अभिमन्युदासः अवदत् यत् एषा परम्परा प्रायः पञ्चशतवर्षप्राचीना अस्ति। मान्यता अस्ति यत् स्वयं श्रीचैतन्यमहाप्रभुणा प्रायः पञ्चशतवर्षपूर्वं पुरीनगरे स्वहस्तैः गुण्डिचामन्दिरस्य जलप्रक्षालनं कृतम्। तस्मात्कालात् प्रभृति भगवतः मौसीगृहं स्वच्छं शीतलं पवित्रं च कर्तुं एषा सेवा निरन्तरं प्रवर्तते। तेन उक्तं यत् एषा परम्परा केवलं बाह्यशौचपर्यन्ता नास्ति, अपितु अन्तःकरणशुद्धेः सेवाभावस्य च प्रतीकरूपेण अपि मन्यते।

धार्मिकमान्यतानुसारं भगवान् श्रीजगन्नाथः यदा वृन्दावनसुन्दरावलगमनभावेन भवति तदा तस्य नेत्रे विशाले भवतः। सः नवदिनपर्यन्तं मौस्याः गृहे विशेषस्नेहेन सेवया च सह विश्रामं करोति, यत्र तस्मै विविधप्रकाराणि व्यञ्जनानि नैवेद्यरूपेण समर्प्यन्ते। ततः अनन्तरं भगवान् पुनः श्रीमन्दिरं प्रत्यागच्छति।

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Hindusthan Samachar / Dheeraj Maithani